दिल से ईश्वर की प्रार्थना करना और मन से दीन दुखियों देश की सेवा और शरीर से कार्य करूँगा क्यों कि गुरु जी ने कंहा कि ईश्वर से प्रार्थना करना उसे पाने का मूल पाया हैं और दीन दुखियो की सेवा ही उसकी पूजा हैं वाकी सब अपने आप ईश्वर प्रार्थना के दौरान समझा देगा उसकी मन से प्रार्थना कर उसे पाने का प्रयास कर सब कुछ अपने आप मिल जाएगा दुनियाँ में ईश्वर से बड कर और कुछ नहीं ..................
ईश्वर परमप्रकाश स्वरुप है और वह एक ही परमशक्ति में त्रिलोक मेंव्याप्त है मानवता सेउसका गहरा सम्बन्ध है। परमार्थ और परम प्रेम केद्वारा जो मनुष्य उसे भजता है वो उसे पा लेता है।
ईश्वर क्या है- ईश्वर एक अप्रेमय स्वरुप है उसकीआकृति निर्धारित नहीं की जा सकती वह सच्चिदानंद घन परमात्मा सम्पूण भूतो कीआत्मा है। वह परमप्रकाश स्वरुप परमेश्वर अनंत है।अनादि है वह भौतिक नहींदिव्यस्वरूप है इसलिए वह अनुभवगम्य है सच्चे संत भी ईश्वर के अवतार मानेजाते है।
अखण्ड को खण्ड -खण्ड कोई नहीं कर सकता।
वो ईश्वर या खुदा ,गॉड अलग नहीं हो सकता।
सबका का ईश्वर एक है -क्योंकि परमेश्वर सारेसंसार को व्याप्त करके स्थित है। वो अपनी विभूतियों के द्वारा सारे सृष्टिचक्र को चला रहा है। संसार में सूर्य एक है चन्द्रमा एक हैऔर एक ही समीरसारे जगत में वह रहा है सभी मनुष्यों की वनबाट व आहार - विहार एक जैसे हीहैसभी को एक ही चेतन शक्ति संचालित कर रही है इस दृष्टि से भी ईश्वर एकहै। प्रकृति भी किसी के साथ में भेद भाव नहीं रखती तो इस दृष्टि से भी हमेंएकता का ही सबक मिलता है। सारी मानव जाति एक है मानवी धर्म एक तो ईश्वरअलग -अलग कैसे हो सकता है। एक ही परमात्मा को अलग -अलग धर्म अलग अलग भाषाओमें कोई ईश्वर कोई अल्ला कोई गौड़ कहलाता है किन्तु नाम तो पुकारने का एकसाधन है परमेश्वर तो भावक की भाष को सुनता है अतः सबका ईश्वर एक है।उसमेभिन्नता रखना हमारा ही अज्ञानहै।
पाने के साधन -ईश्वर से लौ लगानाईश्वर प्राप्तिका मूल आधार है जो की ईश्वर में पूर्ण आस्था होने पर ही संभव है। अर्थातपूर्ण श्रद्धा दृणु विश्वास और अन्यन प्रेम में दीवाना होनायही भक्तिकहलाती है क्योकि ईश्वर प्रेम में है घृणा में नहीं I वो सत्य में है।पाखण्ड में नहीं इसलिए उसे परम प्रेम के पावन भावो से ही पाया जा सकता हैईश्वर सभी मनुष्यों के ह्रदय में स्थितहै और उसे पाने के साधन भी ह्रदयमें ही विद्यमान है किसी भी विषेश क्षेत्र वभौतिक पद्यति से उसे नहींपाया जा सकता
प्रभु प्रेम का तूफान जब उठता है मन के आँगन में
हो जाता है। साकार ईश्वर उन आँखों के आँगन में
उपसंहार -हम एक ही परम प्रकाश स्वरुप परमेश्वर कीक्षत्रछाया में है।अगर हम स्वार्थरहित होकर प्यार और ईमानदारी से कर्मकरे तो मालिक का सच्चा प्यार पाते है जब हमारे ह्रदय में प्रेम का सावनबरसता है तब मानवता और ईश्वर एक साथ प्रकट हो जाते है।